मनरेगा पंजा हाजिरी प्रकरण में मस्टरोल शून्य कर जिम्मेदारों ने झाड़ा पल्ला, NMMS सिस्टम फिर सवालों के घेरे में,मिस्टेक एक में होती कई में नहीं


हंगामा होते ही कागज साफ, मगर मोबाइल में कैद पंजा हाजिरी दे रही है गवाही।
जिम्मेदार मिस्टेक होने का दे रहे हवाला 
मिस्टेक में एक मस्टरोल में हो सकता है कई में नहीं ?
महराजगंज जनपद के सिसवा ब्लॉक में मनरेगा NMMS हाजिरी में हाथ के पंजे से उपस्थिति दर्ज करने का मामला उजागर होने के बाद अब जिम्मेदारों ने नई चाल चल दी है। भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करने के बजाय, मस्टर रोल को ही शून्य (निरस्त) कर पूरे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है।
जिम्मेदार इसे मिस्टेक होने का हवाला दे रहे है लेकिन बहुत बड़ा सवाल खड़ा यह कर रहा है की मिस्टेक एक मस्त रोल में हो सकता है कई मस्टरोल में हाथ के पंजे से हाजिरी भरना कहीं ना कहीं इस पूरे मनरेगा रहने में हाजिरी पर सवाल खड़ा कर रहा है क्या इसी तरह पूरे जिले में मनरेगा में एनएमएमएस हाजिरी चल रहा है आखिर चल रहा है तो जिम्मेदारों के ऊपर कब होगी कार्रवाई
सूत्रों के अनुसार, जिस ग्राम पंचायत बेलभरिया में अंकुर के खेत से करमही सिवान तक नाला सफाई व मिट्टी कार्य के नाम पर फर्जी हाजिरी सामने आई थी, अब उसी कार्य का मस्टरोल शून्य दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि कोई काम हुआ ही नहीं। यानी पहले कागजों में मजदूर खड़े किए गए और जब मामला खुला तो कागज ही गायब कर दिए गए।
यह सवाल उठना लाजमी है कि
अगर काम ही नहीं हुआ था, तो NMMS ऐप पर हाजिरी किसकी और कैसे दर्ज की गई?
और अगर हाजिरी गलत थी, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यह पूरा घटनाक्रम NMMS निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। सरकार ने जिस सिस्टम को भ्रष्टाचार रोकने के लिए लागू किया, उसी सिस्टम में हाथ के पंजे से हाजिरी भरकर भुगतान का रास्ता तैयार कर लिया गया। अब मस्टरोल शून्य कर देने से क्या मोबाइल ऐप में दर्ज फर्जी हाजिरी अपने आप खत्म हो जाएगी?

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराने के बजाय जिम्मेदारों को बचाने की कवायद तेज हो गई है। न तो पंचायत स्तर पर जवाबदेही तय की गई और न ही ब्लॉक स्तर के अधिकारियों से कोई स्पष्टीकरण सामने आया। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि भ्रष्टाचार सिर्फ नीचे नहीं, बल्कि ऊपर तक संरक्षित है।

इस फॉलोअप से यह भी स्पष्ट होता है कि मनरेगा में गड़बड़ी पकड़ में आते ही कार्रवाई नहीं, बल्कि कागजी जादू शुरू हो जाता है। मस्टरोल शून्य करना समाधान नहीं, बल्कि सबूत मिटाने की कोशिश माना जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि
क्या NMMS हाजिरी में दर्ज पंजा फोटो की जांच होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की जाएगी?
या फिर यह मामला भी अन्य मनरेगा घोटालों की तरह फाइलों में दबाकर खत्म कर दिया जाएगा?
फिलहाल इतना तय है कि
मस्टरोल भले ही शून्य कर दिया गया हो, लेकिन NMMS में दर्ज सच्चाई सिस्टम और जिम्मेदारों—दोनों को कठघरे में खड़ा कर रही है।
अब देखना यह है कि
कार्रवाई होती है या फिर एक बार फिर भ्रष्टाचार जीत जाता है!



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